एक सुंदर बगीचे में बहुत सारे रंग-बिरंगे कीड़े-मकोड़े मिल-जुलकर रहते थे। वहाँ के बड़े बुजुर्गों ने कुछ नियम बनाए थे कि कौन सा रस पीना है और कौन सी पत्ती खानी है। लेकिन मीनाक्षी नाम की एक नन्हीं गुबरैला (beetle) को ये नियम पसंद नहीं थे। उसे लगता था कि नियम उसकी आज़ादी छीन रहे हैं।
एक दिन, मीनाक्षी ने अपनी ज़िद में एक अजीब सी काली और कड़वी पत्ती चखने का फैसला किया। उसने सोचा, 'मैं वही क्यों खाऊँ जो सब कहते हैं?' जैसे ही उसने उस पत्ती को खाया, उसके मुँह और जीभ में तेज़ जलन होने लगी। उसे इतना दर्द हुआ कि वह बोल भी नहीं पा रही थी। वह रोती हुई बड़े कीड़ों के पास मदद के लिए गई।
बुज़ुर्ग कीड़े ने दुखी होकर कहा, 'मीनाक्षी, वे नियम तुम्हारी सुरक्षा के लिए थे। तुमने उन्हें नहीं माना, इसलिए तुमने अपनी आवाज़ खो दी है।' मीनाक्षी बहुत उदास हो गई। वह न तो किसी से बात कर सकती थी और न ही खेल सकती थी, इसलिए वह बगीचे के एक कोने में अकेली रहने लगी।
उसके दोस्त नीला और सोमू उसे देखकर बहुत दुखी थे। उन्होंने सोचा कि मीनाक्षी को फिर से खुश कैसे किया जाए। उन्होंने एक छोटा सा संगीत कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया। नीला ताल देने के लिए तैयार थी और सोमू गाना गाने के लिए। लेकिन उनके पास संगीत बजाने के लिए कोई वाद्य यंत्र नहीं था।
वे मीनाक्षी के पास गए और बोले, 'मीनाक्षी, हम जानते हैं कि तुम बोल नहीं सकती, लेकिन क्या तुम इस छोटी सी बाँसुरी को बजाकर हमारी मदद करोगी?' मीनाक्षी ने हिचकिचाते हुए बाँसुरी ली। शुरू में आवाज़ बहुत अजीब थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी और खूब अभ्यास किया। धीरे-धीरे, उसके मुँह से बहुत ही मधुर संगीत निकलने लगा।
उसकी मीठी धुन सुनकर पूरा बगीचा मंत्रमुग्ध हो गया। मीनाक्षी ने सीखा कि भले ही उसने एक गलती की थी, लेकिन उस गलती ने उसे संगीत की एक नई और अद्भुत दुनिया से मिला दिया। अब वह बगीचे की सबसे मशहूर संगीतकार बन गई थी।
Moral
अनुशासन का पालन करना ज़रूरी है, लेकिन कठिनाइयों में भी नए रास्ते खोजे जा सकते हैं।