एक सुंदर घाटी में सैमुअल नाम का एक मेहनती किसान रहता था। उसने अपने कठिन परिश्रम से एक बहुत बड़ा आम का बगीचा बनाया था। उसके बगीचे के आम पूरे इलाके में सबसे मीठे थे।
एक दिन जब सैमुअल अपने बगीचे की देखभाल कर रहा था, उसने देखा कि एक अजनबी पेड़ की ऊँची शाखा पर बैठकर आम तोड़ रहा है।
"कृपया रुकिए!" सैमुअल ने शांति से कहा। "यह मेरा बगीचा है। मैंने इन पेड़ों को पालने में बहुत मेहनत की है। बिना अनुमति के फल लेना गलत है।"
उस आदमी ने उपहास करते हुए कहा, "यह दुनिया प्रकृति की है। यह पेड़, यह मिट्टी और ये फल सब कुदरत के हैं। मैं कुदरत की चीज़ ले रहा हूँ, तो मुझे तुमसे पूछने की क्या ज़रूरत है?"
सैमुअल समझ गया कि बहस करने से काम नहीं चलेगा। वह एक लंबी लकड़ी लेकर आया और उस आदमी को नीचे उतरने को कहा। जब वह नीचे आया, तो सैमुअल ने उसे डराने के लिए लकड़ी उठाई।
अजनबी चिल्लाया, "तुम मुझे क्यों मार रहे हो?"
सैमुअल ने बड़ी शांति से जवाब दिया, "अगर सब कुछ कुदरत का है, तो यह ज़मीन भी कुदरत की है और यह लकड़ी भी कुदरत की ही देन है। अगर मैं इस कुदरती लकड़ी से तुम्हें सुधार रहा हूँ, तो यह भी तो कुदरत का ही काम है, है ना?"
वह आदमी सन्न रह गया। उसे अपनी मूर्खता समझ आ गई। उसने अपनी चोरी को छिपाने के लिए कुदरत का नाम लिया था, लेकिन अब वह उसी तर्क से बच नहीं सकता था। वह शर्मिंदा होकर वहाँ से चला गया।
Moral
गलत काम को सही ठहराने के लिए झूठे तर्क नहीं देने चाहिए।