एक छोटे से गाँव में कविन नाम का एक लड़का अपने पिता रवि और दादाजी के साथ रहता था। कविन की माँ के निधन के बाद, घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ रवि और कविन ही उठाते थे। दादाजी काफी वृद्ध थे, इसलिए उन्हें चीज़ें पकड़ने या चलने में थोड़ी कठिनाई होती थी।
एक सुबह, जब दादाजी नाश्ता कर रहे थे, अचानक उनके हाथ से धातु की थाली छूटकर ज़मीन पर गिर गई। 'झनझनाहट!' की तेज़ आवाज़ हुई। इस शोर से रवि को बहुत गुस्सा आया। उसने चिल्लाते हुए कहा, "दादाजी, क्या आप थोड़ा ध्यान नहीं रख सकते? हर बार ऐसा ही होता है!"
दादाजी चुपचाप सिर झुकाकर बैठ गए। कविन यह सब देख रहा था और उसे बहुत बुरा लगा। वह जानता था कि दादाजी जानबूझकर ऐसा नहीं करते, बल्कि उनकी उम्र के कारण उनके हाथ काँपते हैं।
दोपहर में, कविन ने बगीचे से लकड़ी के कुछ टुकड़े इकट्ठे किए और बड़ी मेहनत से एक सुंदर लकड़ी की थाली बनाई। जब रवि ने उसे देखा, तो उसने पूछा, "कविन, तुम यह क्या बना रहे हो?"
कविन ने बहुत ही मासूमियत से कहा, "पिताजी, जब धातु की थाली गिरती है, तो बहुत तेज़ आवाज़ होती है। इसलिए मैं यह लकड़ी की थाली बना रहा हूँ। और मैं आपके लिए भी एक बना रहा हूँ। जब आप बूढ़े हो जाएँगे और आपके हाथ काँपने लगेंगे, तब अगर आपसे थाली गिर भी जाए, तो मैं आप पर चिल्लाऊँगा नहीं, बल्कि आपको यह शांत लकड़ी की थाली दूँगा।"
कविन की बात सुनकर रवि सन्न रह गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने महसूस किया कि वह अपने बेटे को कैसा व्यवहार करना सिखा रहा है। रवि की आँखों में आँसू आ गए। उसने तुरंत दादाजी से माफी माँगी और कविन से वादा किया कि वह अब से दादाजी का बहुत सम्मान और प्यार से ख्याल रखेगा।
Moral
हम आज अपने बड़ों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, कल हमारे बच्चे हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे।