एक समय की बात है, एक विशाल जंगल में सभी जानवर मिल-जुलकर रहते थे। लेकिन, एक घमंडी शेर ने पूरे जंगल पर अपना नियंत्रण कर लिया था और वह सभी जानवरों पर अपने कठोर नियम थोपता था। यह देखकर एक नन्हे खरगोश ने 'वन शांति समूह' नाम की एक संस्था बनाई। इस समूह का उद्देश्य यह था कि जंगल के सभी जानवर, चाहे वे बड़े हों या छोटे, बिना किसी डर के समान रूप से रह सकें।
जब शेर को इस समूह के बारे में पता चला, तो वह गुस्से से दहाड़ा, 'एक छोटा सा खरगोश मेरी सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत कैसे कर सकता है!' उसने इस समूह को गैरकानूनी घोषित कर दिया और खरगोश को सबक सिखाने के लिए उसे दंड देने का फैसला किया। उसे जंगल की अदालत में बुलाया गया, जहाँ एक बड़ा भालू न्यायाधीश बना बैठा था।
भालू न्यायाधीश ने फैसला सुनाया, 'तुमने जंगल के नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें तीन महीने के लिए जंगल से बाहर निकाल दिया जाता है!'
सजा सुनकर खरगोश डरा नहीं, बल्कि वह जोर-जोर से हंसने लगा। 'हा... हा... हा!' उसकी हंसी पूरे जंगल में गूंज उठी।
न्यायाधीश भालू हैरान रह गया और उसने पूछा, 'तुम हंस क्यों रहे हो? तुम्हें सजा मिली है!'
खरगोश ने शांति से जवाब दिया, 'न्यायाधीश महोदय, मैं इसलिए हंस रहा हूँ क्योंकि यह स्थिति बहुत ही अजीब है। क्या मैं कोई चोर हूँ जिसने खाना चुराया है? क्या मैं कोई शिकारी हूँ जिसने दूसरों को नुकसान पहुँचाया है? नहीं, मैंने तो बस जंगल की शांति के लिए काम किया है। शांति की बात करने वाले एक छोटे से खरगोश को इतनी बड़ी सजा देना कितना मजाकिया है!'
खरगोश की बात सुनकर अदालत में मौजूद सभी जानवर हंसने लगे। न्यायाधीश भालू को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और वह शर्मिंदा हो गया। खरगोश की बहादुरी ने सभी जानवरों को सच्चाई के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी।
Moral
सच्चाई और साहस के सामने डर टिक नहीं सकता।