एक सुंदर से गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। आर्यन बहुत प्यारा था, लेकिन उसकी एक आदत थी—उसे हर चीज़ में या तो बहुत ज़्यादा लालच आता था या फिर बहुत ज़्यादा चिढ़। अगर उसे कोई खिलौना चाहिए होता और वह नहीं मिलता, तो वह रोने लगता। अगर कोई खेल उसके मन मुताबिक नहीं होता, तो वह गुस्सा हो जाता।
उसके दादाजी, माधव जी, बहुत ही शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। एक दिन आर्यन बहुत उदास होकर घर आया। वह अपने दोस्त कबीर के साथ खेल रहा था। कबीर के पास एक बहुत सुंदर लकड़ी का लट्टू था। आर्यन उसे पाना चाहता था, लेकिन जब कबीर ने मना कर दिया, तो आर्यन गुस्से में पैर पटकते हुए घर आ गया।
'दादाजी, यह ठीक नहीं है! मुझे वह खिलौना चाहिए था!' आर्यन रोते हुए बोला। 'मुझे हर चीज़ चाहिए, और जब चीज़ें वैसी नहीं होती जैसी मैं चाहता हूँ, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है!'
दादाजी ने उसे प्यार से पास बिठाया और कहा, 'बेटा, तुम्हारी उदासी तुम्हारी इच्छाओं से आती है, और तुम्हारा गुस्सा तुम्हारी नापसंदगी से। ईश्वर को देखो, उन्हें न तो किसी चीज़ की लालसा है और न ही किसी से कोई द्वेष। जो उस शांत ईश्वर का ध्यान करते हैं, उनके जीवन में दुख नहीं आता। यदि तुम भी अपनी इच्छाओं और चिढ़ को काबू में रखना सीख जाओ, तो कोई भी मुसीबत तुम्हें दुखी नहीं कर पाएगी।'
अगले दिन खेलते समय आर्यन का पसंदीदा मिट्टी का सीटी टूट गया। पहले वाला आर्यन होता तो चिल्लाता, लेकिन आज उसने दादाजी की बात याद रखी। उसने गहरी साँस ली और सोचा, 'कोई बात नहीं, मैं इसे ठीक कर सकता हूँ या कुछ और खेल सकता हूँ।' उस दिन आर्यन को एक अनोखी शांति महसूस हुई। उसने समझ लिया कि जब हम चीज़ों के पीछे भागना और उनसे चिढ़ना छोड़ देते हैं, तभी असली खुशी मिलती है।