एक शांत गाँव में माधव और मीरा नाम का एक जोड़ा रहता था। माधव बहुत मेहनती था, लेकिन काम के बोझ से कभी-कभी वह बहुत निराश और थका हुआ महसूस करता था। मीरा उस घर की आत्मा थी। उसने घर को केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि प्यार का मंदिर बना दिया था। जब भी माधव थका-हारा घर लौटता, मीरा की मुस्कान और उसकी ममता उसे नई ऊर्जा से भर देती थी। मीरा का साथ ही माधव की असली ताकत थी।
उनके दो बच्चे थे, अर्जुन और अनन्या। मीरा ने उन्हें केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करना और बड़ों का सम्मान करना भी सिखाया था। एक बार गाँव के मेले में, अर्जुन से गलती से एक बुजुर्ग व्यक्ति का सामान गिर गया। तुरंत ही अनन्या दौड़कर गई, सामान उठाया और उनसे माफी मांगी। बच्चों के इस व्यवहार को देखकर गाँव वाले कहने लगे, 'यह सब मीरा के संस्कारों का फल है।' अपने परिवार को खुश देखकर माधव को अहसास हुआ कि मीरा उसके जीवन का गौरव है, और उनके ये संस्कारी बच्चे उस गौरव के अनमोल रत्न हैं।