एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का लड़का और उसके दादाजी, रामलाल रहते थे। रामलाल जी अपनी ईमानदारी और न्याय के लिए पूरे गाँव में जाने जाते थे। एक दिन आर्यन के दो दोस्तों, समीर और राहुल के बीच झगड़ा हो गया। समीर के पास एक सुंदर लकड़ी का खिलौना था, जिसे खेलते समय राहुल से गलती से टूट गया। समीर रोते हुए दादाजी के पास गया। राहुल डरते हुए बोला, 'मैंने यह जानबूझकर नहीं किया।'
दादाजी वहाँ पहुँचे। उन्होंने किसी एक का पक्ष नहीं लिया। उन्होंने समीर का दुख भी समझा और राहुल की बात भी सुनी। उन्होंने कहा, 'समीर, तुम्हारा खिलौना टूट गया है, तुम्हारा दुखी होना स्वाभाविक है। लेकिन राहुल ने यह जानबूझकर नहीं किया, यह एक दुर्घटना थी।' उन्होंने राहुल से कहा कि वह समीर की मदद करे ताकि खिलौना ठीक हो सके।
दादाजी ने किसी एक का साथ देने के बजाय सच्चाई का साथ दिया। दोनों बच्चे खुश थे क्योंकि उन्हें लगा कि उनके साथ न्याय हुआ है। आर्यन ने सीखा कि एक बुद्धिमान व्यक्ति को हमेशा तराजू की तरह निष्पक्ष रहना चाहिए।