एक शांत गाँव में सोमू और रघु दो दोस्त रहते थे। सोमू एक मेहनती इंसान था जो अपनी पत्नी नीला और अपने छोटे से परिवार के साथ बहुत खुश था। लेकिन रघु को हमेशा दूसरों की चीज़ों में दिलचस्पी रहती थी। उसे लगता था कि जो दूसरों के पास है, वही सबसे अच्छा है।
एक शाम, जब सोमू काम पर गया हुआ था, रघु उसके घर के दरवाजे पर खड़ा होकर उनके घर की शांति और खुशहाली को देख रहा था। सोमू के परिवार की सुख-शांति देखकर रघु के मन में एक गलत विचार आया। उसने सोचा, 'सोमू के पास जो सुख है, वह मुझे क्यों नहीं मिल सकता?' वह सोमू के जीवन और उसके परिवार की खुशियों को पाने की गलत इच्छा करने लगा। वह यह नहीं समझ पा रहा था कि दूसरे के घर की खुशियों पर नज़र रखना कितना बड़ा मूर्खतापूर्ण काम है।
अगले दिन सोमू ने रघु की आँखों में वह बेचैनी देख ली। सोमू ने प्यार से समझाया, 'रघु, हमें अपने पास जो है उसमें संतोष करना चाहिए। दूसरों के घर और उनके परिवार की खुशियों पर बुरी नज़र रखना खुद को ही नुकसान पहुँचाना है।' रघु को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि दूसरों के वैवाहिक और पारिवारिक जीवन का सम्मान करना ही असली धर्म है और उसे चाहना सबसे बड़ी मूर्खता है। उस दिन के बाद रघु ने अपने जीवन को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया।