एक सुंदर से गाँव में कदिर नाम का एक लड़का रहता था। कदिर बहुत ऊर्जावान था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह बिना सोचे-समझे बस बोलता रहता था। वह अक्सर दूसरों का मज़ाक उड़ाता और बेकार की बातें करता था।
एक शाम, उसके दादाजी ने उसे समझाया, 'कदिर, शब्द बीजों की तरह होते हैं। कुछ शब्द सुंदर फूलों की तरह उगते हैं जो दूसरों को खुशी देते हैं, और कुछ शब्द सूखे पत्तों की तरह होते हैं जिनका कोई मोल नहीं होता।'
अगले दिन स्कूल में, कदिर ने अपने दोस्त अर्जुन को जूते के फीते बाँधने में संघर्ष करते देखा। मदद करने के बजाय, कदिर ज़ोर से हँसा और बोला, 'अर्जुन, तुम कितने धीमे हो! तुम कभी तेज़ नहीं दौड़ पाओगे!' अर्जुन शर्मिंदा होकर चुपचाप बैठ गया।
उसी दोपहर, खेलते समय कदिर का पैर फिसल गया और उसके घुटने में गहरी चोट लग गई। दर्द के मारे वह चिल्लाने लगा, 'बचाओ! कोई मेरी मदद करो!' लेकिन क्योंकि कदिर हमेशा बिना वजह शोर मचाता रहता था, पड़ोसियों को लगा कि वह फिर से खेल रहा है और किसी ने ध्यान नहीं दिया।
तभी उसके दादाजी वहाँ आए और उसकी मदद की। दादाजी ने प्यार से कहा, 'कदिर, जब तुम बोलते हो, तो सोचो कि क्या तुम्हारे शब्द किसी के काम आएंगे? अर्जुन के प्रति तुम्हारे शब्द बेकार और कड़वे थे। आज तुम्हारी पुकार पर किसी ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि तुम्हारे शोर की कोई कीमत नहीं रह गई थी। केवल वही बोलो जो उपयोगी हो।'
कदिर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उस दिन के बाद, वह बोलने से पहले सोचने लगा। उसने अपनी बातों का उपयोग दूसरों को प्रोत्साहित करने और मदद करने के लिए करना शुरू कर दिया।