एक शांत गाँव में कवि और रोहन नाम के दो दोस्त रहते थे। कवि बहुत ही नेक दिल था, लेकिन रोहन अक्सर दूसरों को धोखा देकर आगे बढ़ने की कोशिश करता था। एक दिन, रोहन की नज़र कवि के पास रखे एक सुंदर लकड़ी के खिलौने पर पड़ी। उसके मन में लालच आ गया और उसने सोचा, 'जब कोई नहीं देख रहा होगा, तब मैं इसे चुरा लूँगा।' उसने चुपके से खिलौना चुरा लिया और अपने पास छिपा लिया। शुरुआत में रोहन को बहुत अच्छा लगा, लेकिन जल्द ही उसे एहसास हुआ कि कुछ गलत है। वह जहाँ भी जाता, उसे एक अनजाना डर और बेचैनी महसूस होती। उसे ऐसा लगता जैसे उसका अपना ही पाप उसकी परछाई बनकर उसके पीछे चल रहा है। वह न तो चैन से सो पाता था और न ही खेल पाता था। उसका मन हमेशा अशांत रहता था। अंत में, अपनी गलती का पछतावा होने पर, रोहन ने कवि के पास जाकर अपनी चोरी स्वीकार कर ली और खिलौना लौटा दिया। सच बोलने के बाद ही उसके मन का बोझ हल्का हुआ और उसे शांति मिली।
रोहन का किया हुआ बुरा काम उसकी परछाई की तरह उसका पीछा कर रहा था।