एक सुंदर से गाँव में मारन नाम का एक किसान रहता था। उसके पास बहुत सारी ज़मीन और अनाज के भंडार थे। लेकिन मारन एक अजीब इंसान था। उसे हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं उसकी संपत्ति कम न हो जाए। वह अपनी चीज़ों को बचाने में इतना व्यस्त रहता था कि किसी की मदद तक नहीं करता था।
उसी गाँव में कबीर नाम का एक गरीब मज़दूर रहता था। कबीर के पास धन तो नहीं था, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। एक बार गाँव में भीषण सूखा पड़ा। फसलें बर्बाद हो गईं और लोग खाने के लिए तरसने लगे। मारन ने अपने अनाज के गोदामों को कसकर बंद कर लिया और डर के मारे पहरा देने लगा कि कहीं कोई चोरी न कर ले।
दूसरी ओर, कबीर ने जो कुछ भी उसके पास थोड़ा-बहुत था, उसे दूसरों के साथ बाँटना शुरू कर दिया। एक दिन उसने एक छोटी बच्ची को भूख से रोते देखा। कबीर ने बिना सोचे अपनी आखिरी रोटी उस बच्ची को दे दी। उस बच्ची की मुस्कान देखकर कबीर का दिल खुशी से भर गया। उसे महसूस हुआ कि देने में जो सुख है, वह संचय करने में नहीं है।
कुछ समय बाद बारिश हुई। मारन के पास उसका सारा धन वैसा ही था, लेकिन वह अकेला और डरा हुआ रहता था। कबीर गाँव वालों के बीच बहुत खुश था। मारन ने कबीर से पूछा, 'कबीर, तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है, फिर तुम इतने खुश कैसे हो?' कबीर ने शांति से कहा, 'मारन भाई, दूसरों को देने से जो सुकून मिलता है, वह धन इकट्ठा करने से नहीं मिलता।' उस दिन मारन समझ गया कि असली खुशी चीज़ों को बटोरने में नहीं, बल्कि बाँटने में है।