एक छोटे से गाँव में दो भाई रहते थे, आर्यन और कबीर। आर्यन बहुत ही गुस्सैल स्वभाव का था, उसे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था। वहीं कबीर बहुत ही शांत और समझदार था।
एक दोपहर दोनों बगीचे में खेल रहे थे। आर्यन एक लकड़ी की छड़ी से खेल रहा था। खेलते-खेलते अचानक उसका हाथ लगा और कबीर का पसंदीदा खिलौना टूट गया। यह देखकर आर्यन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह कबीर पर चिल्लाने और उसे मारने के लिए आगे बढ़ा।
तभी उनके पिता वहाँ आ गए। उन्होंने आर्यन का हाथ पकड़कर बड़े प्यार से समझाया, 'आर्यन, गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन असली बहादुरी तब है जब तुम अपने गुस्से को उस समय रोक सको जब वह किसी को चोट पहुँचा सकता हो। अगर तुम अभी अपना गुस्सा निकालोगे, तो कबीर को चोट लगेगी और उसका मन भी दुखेगा। उस समय खुद पर काबू पाना ही तुम्हारी असली जीत है।'
आर्यन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने एक गहरी साँस ली और अपना गुस्सा शांत किया। उसने कबीर से कहा, 'मुझे माफ़ कर दो कबीर, यह गलती से हो गया।' उस दिन आर्यन ने सीखा कि क्रोध को सही समय पर रोकना ही सबसे बड़ा गुण है।