एक सुंदर से गाँव में कथिर नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही ईमानदार और नेक दिल का था। एक दिन जंगल के पास खेलते समय, कथिर को झाड़ियों में छिपा हुआ एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला। जब उसने उसे खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं—वह सोने के सिक्कों से भरा हुआ था!
'अगर मैं इसे रख लूँ, तो मैं बहुत अमीर बन जाऊँगा! मैं नए कपड़े और ढेर सारे खिलौने खरीद सकूँगा!' कथिर ने सोचा। लेकिन तभी उसे गाँव के बुजुर्ग माणिकम दादा की याद आई। उसने देखा था कि कैसे माणिकम दादा अपनी जमा पूँजी खो जाने के कारण बहुत दुखी थे। कथिर ने सोचा, 'अगर मैं यह सोना रख लूँ, तो मैं तो खुश हो जाऊँगा, लेकिन दादाजी कितने दुखी होंगे?'
कथिर का मन भारी हो गया। उसने महसूस किया कि दूसरों को दुख देकर पाया गया धन उसे कभी सच्ची खुशी नहीं दे सकता। उसने संदूक उठाया और सीधे माणिकम दादा के पास पहुँचा। संदूक देखकर दादाजी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने कथिर को गले लगा लिया और कहा, 'बेटा, तुम बहुत महान हो! यह धन तो आता-जाता रहता है, पर तुम्हारा यह साफ दिल ही असली खजाना है।' कथिर उस दिन बहुत सुकून के साथ घर लौटा। उसने सीखा कि दूसरों का दिल दुखाकर मिली सफलता का कोई मोल नहीं होता।