एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। उसके दादाजी बहुत ज्ञानी और सरल स्वभाव के थे। एक बार गाँव में एक बड़ा उत्सव मनाया जाना था। गाँव के बुजुर्गों ने तय किया कि उत्सव की खुशहाली के लिए एक मेमने की बलि दी जाएगी। उनका मानना था कि इससे गाँव में बहुत समृद्धि आएगी।
अर्जुन थोड़ा उलझन में था। उसने अपने दादाजी से पूछा, "दादाजी, क्या मेमने की बलि देने से हमें बहुत बड़ा लाभ और ईश्वर का आशीर्वाद नहीं मिलेगा?"
दादाजी ने उसे पास बिठाया और प्यार से समझाया, "बेटा, किसी जीव की जान लेकर जो लाभ मिलता है, वह बाहर से बहुत बड़ा लग सकता है। लेकिन जो लोग वास्तव में ज्ञानी होते हैं, उनके लिए ऐसा करना अपमानजनक है। जीवन की रक्षा करना ही असली धर्म है। किसी की हत्या करके प्राप्त किया गया सुख या लाभ कभी भी सच्चा नहीं होता और वह हमारे मन को कलंकित करता है।"
दादाजी की बात सुनकर गाँव वालों ने अपना निर्णय बदल लिया। उन्होंने बलि देने के बजाय फल, फूल और मधुर गीतों से उत्सव मनाया। अर्जुन ने उस दिन सीखा कि दया और करुणा ही सबसे बड़ा धर्म है।