पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। अर्जुन का मन हमेशा विचारों के भंवर में रहता था। 'कल स्कूल में क्या होगा? अगले हफ्ते मुझे वह खिलौना मिलेगा क्या? छुट्टियों में हम कहाँ जाएंगे?' उसके दिमाग में विचारों की एक अंतहीन दौड़ चलती रहती थी।
एक दोपहर, बगीचे में खेलते समय, अर्जुन ने एक बहुत ही सुंदर तितली देखी। जैसे ही उसने उसे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तितली उड़ गई। अर्जुन उदास होकर बोला, 'दादाजी, मैं सोच ही रहा था कि आगे क्या करना है, और तब तक तितली चली गई! मैं कभी किसी चीज़ का आनंद नहीं ले पाता।'
दादाजी ने उसे पास बिठाया और प्यार से समझाया, 'अर्जुन, तुम कल के बारे में इतना सोचते हो कि तुम आज के इस सुंदर पल को खो देते हो। जो लोग यह नहीं जानते कि वे अगले ही पल जीवित रहेंगे या नहीं, वे भविष्य की अनगिनत चिंताओं में डूबे रहते हैं। जीवन अनिश्चित है, इसलिए जो पल तुम्हारे पास अभी है, उसे पूरी तरह जीना ही समझदारी है।'
अर्जुन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने तय किया कि वह भविष्य की चिंताओं में खोकर आज की खुशियों को नज़रअंदाज़ नहीं करेगा। उसने गहरी सांस ली और बगीचे की ताजी हवा और फूलों की खुशबू का आनंद लेने लगा।