एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन को नई चीज़ों का बहुत शौक था। अगर उसे कोई खिलौना या मिठाई नहीं मिलती, तो वह बहुत परेशान हो जाता था। उसके मन में हमेशा बस 'मुझे यह चाहिए' ही चलता रहता था।
एक दिन, एक लकड़ी के लट्टू के लिए ज़िद करते हुए अर्जुन बहुत दुखी था। वह अपने दादाजी, माधव के पास गया। 'दादाजी, मुझे सब कुछ चाहिए, लेकिन ये इच्छाएँ मुझे बहुत परेशान करती हैं। मैं क्या करूँ?' उसने उदास होकर पूछा।
दादाजी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, 'अर्जुन, अगर तुम अपनी इच्छाओं से लड़ने की कोशिश करोगे, तो वे और बढ़ जाएँगी। तुम्हें बस एक बड़ी इच्छा ढूँढनी होगी।'
'बड़ी इच्छा?' अर्जुन ने हैरानी से पूछा।
'हाँ,' दादाजी ने समझाया, 'दूसरों की मदद करने की इच्छा, या कुछ अच्छा सीखने की इच्छा। अगर तुम अच्छाई और सेवा की इच्छा को मजबूती से पकड़ लोगे, तो तुम्हारी ये छोटी-छोटी लालच वाली इच्छाएँ अपने आप खत्म हो जाएँगी। शांति और परोपकार की राह को अपनाना ही असली जीत है।'
अर्जुन को बात समझ आ गई। अगले दिन, उसने खिलौने के लिए रोने के बजाय, अपनी पड़ोसन दादी की मदद करने का निश्चय किया। जब उसने दूसरों की मदद की, तो उसे जो खुशी मिली, उसने उसके पुराने लालच को भुला दिया। उसे समझ आ गया कि एक महान उद्देश्य छोटी इच्छाओं को मिटा देता है।