पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी, विश्वनाथ के साथ रहता था। अर्जुन बहुत ही प्यारा बच्चा था, लेकिन उसका मन हमेशा उलझनों में रहता था। 'क्या मैं सही कर रहा हूँ?', 'लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?'—ऐसे अनगिनत संदेह उसे परेशान करते रहते थे। इन संदेहों के कारण उसे कभी शांति महसूस नहीं होती थी।
एक रात, जब आसमान तारों से जगमगा रहा था, अर्जुन ने अपने दादाजी से पूछा, "दादाजी, वे तारे कितने दूर हैं! क्या हम कभी उन तक पहुँच पाएंगे?"
दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा अर्जुन, तारे दूर नहीं हैं, बल्कि तुम्हारे मन के संदेह तुम्हें उनसे दूर रखते हैं। जिस दिन तुम अपने मन से इन सभी शंकाओं और डरों को मिटा दोगे और एक शुद्ध व स्पष्ट मन के साथ जियोगे, उस दिन यह आकाश तुम्हें धरती से भी अधिक करीब महसूस होगा। स्वर्ग कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर की शांति में है।"
अर्जुन ने दादाजी की बात को गाँठ बाँध लिया। उसने धीरे-धीरे अपने मन के डर और दूसरों के निर्णय की चिंता करना छोड़ दिया। उसने सच्चाई और स्पष्टता के साथ जीना शुरू किया। कुछ समय बाद, जब वह सुबह की पहली किरण को देख रहा था, उसे एक अद्भुत शांति का अनुभव हुआ। उसे लगा कि ब्रह्मांड की सारी सुंदरता उसके बहुत करीब है। उसका मन अब साफ था, और उसे हर चीज़ में दिव्यता दिखने लगी थी।