पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन अपने दादाजी के साथ रहता था। एक दिन जंगल में टहलते समय, अर्जुन ने एक बड़ी चट्टान के पीछे कुछ चमकते हुए देखा। 'दादाजी, देखिए! कितना सुंदर हीरा है!' अर्जुन खुशी से चिल्लाया।
उसके दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'अर्जुन, अभी से यह मत मान लो कि यह हीरा है। चलो देखते हैं कि यह असल में क्या है।' जब वे पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि सूरज की रोशनी उस चीज़ पर पड़ रही थी और वह केवल कांच का एक टुकड़ा था जो चमक रहा था। अर्जुन थोड़ा उदास हो गया।
दादाजी ने उसे समझाते हुए कहा, 'बेटा, कोई चीज़ कैसी भी दिखे—चाहे वह कितनी भी सुंदर या कीमती क्यों न लगे—उसकी असलियत को पहचानना ही असली बुद्धिमानी है। हमें केवल आँखों पर नहीं, बल्कि सच्चाई पर भरोसा करना चाहिए।' उस दिन के बाद से, अर्जुन ने किसी भी चीज़ को बिना सोचे-समझे सच मानना छोड़ दिया।