एक छोटे से गाँव में अन्बू नाम का एक लड़का रहता था। अन्बू को नई चीज़ों का बहुत शौक था—नए खिलौने, नए कपड़े और ढेर सारी मिठाइयाँ। एक दिन गाँव में मेला लगा। मेले में एक चमकता हुआ रोबोट और रंग-बिरंगी मिठाइयाँ देखकर अन्बू के मन में लालच आ गया। वह ज़िद करने लगा, 'पिताजी, मुझे वह रोबोट चाहिए! माँ, मुझे वे सारी मिठाइयाँ चाहिए!'
उसके पिता ने समझाया, 'बेटा, तुम्हारे पास पहले से ही अच्छे खिलौने हैं। अगर तुम हमेशा और पाने की इच्छा करोगे, तो तुम्हें कभी शांति नहीं मिलेगी।' पर अन्बू ने उनकी बात नहीं मानी। उसने अपनी सारी जमा पूँजी खर्च करके वे चीज़ें खरीद लीं।
घर आकर पहले तो वह बहुत खुश हुआ, लेकिन कुछ ही देर में उसका मन ऊब गया। मिठाइयाँ खाने से उसके पेट में दर्द होने लगा और उसे वह रोबोट भी पुराना लगने लगा। उसे लगा जैसे उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी है।
तभी उसके दादाजी ने उसे पास बुलाकर कहा, 'अन्बू, इच्छाएँ उस प्यास की तरह हैं जो कभी नहीं बुझती। इस दुनिया में सबसे बड़ा धन नई चीज़ें पाना नहीं, बल्कि इच्छाओं से मुक्त होना है। जब तुम संतुष्ट होना सीख जाओगे, तभी तुम वास्तव में अमीर बनोगे।' अन्बू को अपनी गलती समझ आ गई। उसने सीखा कि असली खुशी चीज़ों को इकट्ठा करने में नहीं, बल्कि संतोष में है।