एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसमें एक कमी थी—वह बहुत जिद्दी था। उसे लगता था कि उसे सब कुछ पता है, इसलिए वह बड़ों की सलाह नहीं मानता था और अक्सर उनसे ऊँची आवाज़ में बात करता था।
एक दिन गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, दादाजी ने अर्जुन को बुलाया। उन्होंने अर्जुन के हाथ में मिट्टी का एक ढेला दिया और पूछा, 'अर्जुन, अगर तुम्हें इस मिट्टी से एक सुंदर मूर्ति बनानी है, तो तुम्हें क्या करना होगा?' अर्जुन ने गर्व से कहा, 'मैं इसे अपनी मर्जी से बनाऊँगा!' दादाजी मुस्कुराए और बोले, 'बिना सही तकनीक सीखे, तुम केवल मिट्टी को खराब करोगे, सुंदर मूर्ति नहीं बना पाओगे।'
कुछ दिनों बाद, अर्जुन ने लकड़ी का एक छोटा घर बनाने की कोशिश की। उसने अपने पिता की सलाह नहीं मानी और बिना सही माप के काम किया, जिससे वह घर गिर गया। अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि जो लोग दूसरों से अच्छी बातें और सही शिक्षा सीखते हैं, वही दूसरों से विनम्रता और सम्मान के साथ बात करते हैं। उस दिन के बाद, अर्जुन के स्वभाव में बदलाव आया और वह सबके साथ बहुत आदर से बात करने लगा।