एक शांत गाँव में कथिर नाम का एक लड़का रहता था। उसे प्रकृति और बगीचे में घूमना बहुत पसंद था। एक दिन, उसके दोस्त मुकिलन ने कहा, 'कथिर, चलो उस पुरानी और वीरान हवेली में चलते हैं! वहाँ हमें बहुत सारा खजाना मिल सकता है!'
कथिर का मन भी उस हवेली में जाने के लिए मचल उठा। लेकिन तभी उसे अपने दादाजी की बात याद आई: 'अपने मन को हर उस चीज़ के पीछे मत भागने दो जो वह चाहता है, क्योंकि यह तुम्हें गलत रास्ते पर ले जा सकता है।'
कथिर ने रुककर सोचा। उसे लगा कि हवेली में जाना खतरनाक हो सकता है या वह किसी गलत काम में फंस सकता है। उसने मुकिलन से कहा, 'नहीं मुकिलन, वह जगह सुरक्षित नहीं है। चलो, हम यहाँ बगीचे में पौधों को पानी देते हैं, उसमें ज्यादा खुशी मिलेगी।'
मुकिलन चिढ़कर चला गया, लेकिन कथिर ने अपने मन को एक अच्छे काम में लगा दिया। शाम को जब दादाजी ने उसका काम देखा, तो उन्होंने गर्व से उसे गले लगा लिया। कथिर समझ गया कि मन को बुराई से बचाकर अच्छाई में लगाना ही असली बुद्धिमानी है।