एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत होनहार था, लेकिन उसकी एक आदत थी—वह दूसरों की बात पूरी सुनने से पहले ही अपनी बात कहने लगता था। उसे लगता था कि वह सब कुछ जानता है।
एक दिन, उसके दादाजी ने उसे एक पुराना लकड़ी का बक्सा दिया। दादाजी ने कहा, 'अर्जुन, इस बक्से में एक रहस्य छिपा है। इसे जानने के लिए तुम्हें हवाओं और पेड़ों की सरसराहट को ध्यान से सुनना होगा।'
अर्जुन उत्साह में अपनी सहेली मीरा के पास भागा। 'मीरा! दादाजी ने एक रहस्य के बारे में बताया है! हमें उसे ढूँढना होगा!' वह चिल्लाया। मीरा ने शांति से कहा, 'अर्जुन, मुझे लगता है दादाजी किसी चीज़ के बारे में नहीं, बल्कि ध्यान से सुनने के बारे में कह रहे हैं।' लेकिन अर्जुन ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
अगले दिन अर्जुन दादाजी के पास गया और पूछा, 'दादाजी, वह रहस्य क्या है? वह चाबी कहाँ है?' दादाजी मुस्कुराए और बोले, 'अर्जुन, वह चाबी कोई वस्तु नहीं है। दूसरों की बातों को गहराई से समझने का धैर्य ही वह चाबी है। मैं किसी रहस्य की नहीं, बल्कि सुनने की कला की बात कर रहा था।'
अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने शब्द तो सुने थे, लेकिन उनका अर्थ नहीं समझा था। उस दिन के बाद, अर्जुन ने दूसरों की बातों के पीछे छिपे अर्थ को समझना सीखा और वह इस तरह से बात करने लगा कि हर कोई उसे आसानी से समझ सके।