एक सुंदर से गाँव में कविन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसे लगता था कि उसे किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन उसके दादाजी ने उसे समझाया, 'कविन, जंगल के पास जो पुराना कुआँ है, उसके पास मत खेलना, वह बहुत खतरनाक है।' कविन हँसकर बोला, 'दादाजी, मैं अब बड़ा हो गया हूँ, मुझे कुछ नहीं होगा।'
अगले दिन अपने दोस्तों के साथ खेलते समय, कविन उस पुराने कुएँ के पास चला गया। उसने सोचा, 'कुछ नहीं होगा।' लेकिन जैसे ही वह किनारे पर पहुँचा, मिट्टी धंस गई और उसका पैर फिसल गया। वह गिरने ही वाला था कि उसने एक पेड़ की टहनी पकड़ ली। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा और वह बुरी तरह डर गया। तब उसे समझ आया कि दादाजी की बात कितनी सही थी।
उसकी सहेली मीरा दौड़कर आई और उसकी मदद की। उस दिन के बाद से कविन ने कभी किसी चीज़ को हल्के में नहीं लिया। उसने सीखा कि असली समझदारी खतरे को पहचानने और सावधानी बरतने में है।