चोलपुरम नाम के एक सुंदर राज्य में मारन नाम का एक राजकुमार रहता था। मारन बहादुर था, लेकिन उसकी एक बड़ी कमी थी—उसे लगता था कि वह जो कुछ भी करता है, वह हमेशा सही होता है। उसके दरबार के मंत्री और सैनिक हमेशा उसकी हाँ में हाँ मिलाते थे। उसे टोकने वाला कोई नहीं था।
एक बार, मारन ने गाँव के खेतों में जाने वाली नदी का पानी मोड़कर अपने शाही बगीचे में लगाने का आदेश दिया। इससे गाँव वाले पानी के लिए तरसने लगे। मारन के दादा, राजा कारिकालन ने उसे चेतावनी दी, 'बेटा, जिस राजा को टोकने वाला कोई न हो, उसका पतन निश्चित है।' लेकिन मारन ने उनकी बात अनसुनी कर दी।
जल्द ही, मारन के इस फैसले के कारण राज्य में सूखा पड़ने लगा और लोग दुखी हो गए। जब स्थिति बिगड़ने लगी, तो मारन के सबसे अच्छे दोस्त और सेनापति इलंगो ने हिम्मत दिखाई। वह मारन के सामने खड़ा हुआ और बोला, 'राजकुमार, आपका यह निर्णय हमारे लोगों को बर्बाद कर रहा है। कृपया इसे तुरंत बदलें!'
मारन हैरान रह गया। आज तक किसी ने उसे इस तरह टोकने की हिम्मत नहीं की थी। लेकिन जब उसने लोगों की परेशानी देखी, तो उसे अहसास हुआ कि इलंगो सही कह रहा था। उसने तुरंत अपना फैसला बदल दिया और पानी वापस खेतों की ओर मोड़ दिया। राज्य फिर से खुशहाल हो गया। मारन ने सीखा कि जो हमें हमारी गलती पर टोकते हैं, वही हमारे सच्चे मित्र और रक्षक होते हैं।