एक घने जंगल में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने पिता विक्रम के साथ रहता था। एक दिन, वे जंगल में घूम रहे थे कि तभी उन्हें एक छोटा सा तालाब दिखाई दिया। उस तालाब में बहुत सारी मछलियाँ खुशी से तैर रही थीं।
अर्जुन ने उत्साह में कहा, "पिताजी, चलिए अभी इन मछलियों को पकड़ते हैं!" वह जाल लेकर दौड़ने ही वाला था कि विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने प्यार से समझाया, "अर्जुन, देखो मछलियाँ कितनी तेज़ तैर रही हैं। अगर हम अभी कोशिश करेंगे, तो वे भाग जाएँगी। क्या तुमने बगुले को देखा है? बगुला पानी में बिल्कुल शांत खड़ा रहता है और सही समय का इंतज़ार करता है। जब सही मौका आता है, तभी वह झपट्टा मारता है। हमें भी वैसा ही करना चाहिए।"
अर्जुन को पहले थोड़ा बुरा लगा, लेकिन उसने अपने पिता की बात मानी और एक पत्थर पर चुपचाप बैठ गया। कुछ देर बाद, मछलियाँ धीरे-धीरे एक दिशा में तैरने लगीं। अर्जुन समझ गया कि यही सही समय है। उसने अपने पिता के साथ मिलकर बहुत ही सावधानी से जाल फेंका और आसानी से मछलियाँ पकड़ लीं।
अर्जुन ने उस दिन सीखा कि जल्दबाजी करने से बेहतर है कि सही अवसर का इंतज़ार किया जाए।