एक छोटे से गाँव में अर्जुन और लियो नाम के दो लड़के रहते थे। अर्जुन एक बहुत अमीर परिवार से था और उसे अपने महंगे कपड़ों और खिलौनों पर बहुत घमंड था। वहीं लियो एक माली का बेटा था, लेकिन वह बहुत ही नेक दिल और मददगार था।
एक दिन गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, श्री शास्त्री जी, बीमार पड़ गए। उन्हें तुरंत दवा की ज़रूरत थी। अर्जुन ने अपने कीमती कपड़ों को देखते हुए कहा, 'मैं नहीं जा सकता, मेरे कपड़े गंदे हो जाएंगे। कोई और चला जाए।' उसे लगा कि यह छोटा सा काम उसके लायक नहीं है।
लेकिन लियो तुरंत आगे आया और बोला, 'मैं जाऊँगा!' लियो ऊबड़-खाबड़ रास्तों और कीचड़ से होते हुए दौड़कर गया और सही समय पर दवा पहुँचा दी। जब गाँव वालों को पता चला कि लियो ने बिना अपनी परवाह किए मदद की, तो सबने उसकी बहुत प्रशंसा की। अर्जुन को समझ आया कि उसकी अमीरी उसे महान नहीं बनाती, बल्कि लियो के काम ने उसे महान बनाया। इंसान की महानता उसके कपड़ों से नहीं, उसके कर्मों से होती है।