पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में कदिर नाम का एक लड़का रहता था। उसके परिवार का एक छोटा सा बगीचा था। एक साल गाँव में भीषण सूखा पड़ा। बारिश न होने के कारण बगीचे के सारे पौधे सूखने लगे। कदिर के पिता, रवि, बहुत निराश हो गए। उन्होंने हार मानकर कहा, 'अब हमारा क्या होगा?'
कदिर को दुख तो हुआ, लेकिन वह रोया नहीं और न ही डरा। उसने अपने पिता से कहा, 'पिताजी, अगर हम बैठकर दुखी होंगे, तो पौधे और जल्दी सूख जाएंगे। चलिए, हम एक छोटा गड्ढा खोदते हैं ताकि बारिश की एक-एक बूंद को इकट्ठा कर सकें। हमें कोशिश करनी चाहिए।'
कदिर की हिम्मत देखकर पिता भी काम में जुट गए। दोनों ने मिलकर मिट्टी खोदी और पानी जमा करने के लिए एक छोटा गड्ढा बनाया। कदिर बिना थके रोज़ उसकी देखभाल करता रहा। कुछ हफ़्तों बाद, हल्की बारिश हुई। उनके बनाए गड्ढे में पानी जमा हो गया, जिससे उन्होंने अपने कुछ पौधों को बचा लिया।
अगर कदिर हार मान लेता, तो सूखा उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर देता। लेकिन कदिर के साहस ने सूखे की मार को ही मात दे दी। उसने दुख को दुख नहीं दिया, बल्कि साहस से उसका सामना किया।