एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह गाँव के मुखिया का एक भरोसेमंद सहायक था। एक बार गाँव की पुरानी बावड़ी की मरम्मत करने का काम सौंपा जाना था। इसके लिए एक ठेकेदार का चुनाव करना ज़रूरी था।
अर्जुन का दोस्त रवि भी उस काम को पाना चाहता था। रवि के पास न तो अनुभव था और न ही सही औज़ार, लेकिन उसके पास अर्जुन को लालच देने के लिए धन था। रवि ने अर्जुन से अकेले में कहा, "अर्जुन, अगर तुम यह काम मुझे दिला दो, तो मैं तुम्हें बहुत सारे सोने के सिक्के दूँगा। किसी को पता भी नहीं चलेगा।"
अर्जुन एक पल के लिए सोच में पड़ गया। उन सिक्कों से उसका परिवार बहुत सुखी हो सकता था। लेकिन तभी उसके मन में एक विचार आया, 'अगर मैंने यह किया, तो कल जब मैं गाँव वालों से मिलूँगा या इस बावड़ी को देखूँगा, तो मेरा मन खुद से पूछेगा—मैंने ऐसा क्यों किया? क्या मैं इस पछतावे के साथ जी पाऊँगा?' उसे समझ आ गया कि धन से मिलने वाली खुशी, पछतावे के दर्द से बड़ी नहीं हो सकती।
अगले दिन, अर्जुन ने रवि के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सबसे ईमानदार व्यक्ति को काम दिया। रवि नाराज़ हुआ, लेकिन अर्जुन का मन बहुत शांत था। उसे इस बात की खुशी थी कि उसे भविष्य में अपने किए पर शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।