एक समृद्ध राज्य में आर्यमन नाम का एक युवक रहता था। वह राजा का बहुत ही भरोसेमंद मंत्री था। आर्यमन की माँ बहुत वृद्ध और बीमार थीं। उनके पास न तो ठीक से खाने के लिए पैसे थे और न ही दवाइयों के लिए।
एक बार राज्य पर संकट आया और राजा ने आर्यमन को बुलाया। राजा ने कहा, "हमें युद्ध के लिए बहुत सारा धन चाहिए। तुम किसी भी तरह यह धन जुटाओ।" आर्यमन के मन में एक विचार आया। वह राजकोष से कुछ धन गुप्त रूप से निकाल सकता था, जिससे उसकी माँ का इलाज और भोजन का प्रबंध हो जाता। अपनी माँ की दुर्बल अवस्था देखकर उसका मन पसीज गया।
लेकिन तभी उसे अपने गुरु की बातें याद आईं। उसने सोचा, 'यदि मैं चोरी करके अपनी माँ की भूख मिटाता हूँ, तो समाज के विद्वान मुझे कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे। मैं एक अपराधी कहलाऊँगा।' आर्यमन ने कठिन मार्ग चुना। उसने ईमानदारी से काम किया और लोगों के सहयोग से धन एकत्र किया। उसकी ईमानदारी देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने आर्यमन की माँ के इलाज का सारा खर्च स्वयं उठाया। आर्यमन ने अपनी माँ की सेवा भी की और अपना चरित्र भी बचाए रखा।