एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसे पेड़-पौधे लगाने का बहुत शौक था। एक दिन उसने अपने बगीचे में एक बहुत ही सुंदर और दुर्लभ फूलों का पौधा लगाने का फैसला किया।
अर्जुन रोज़ उस पौधे की देखभाल करता, उसे पानी देता और प्यार से बड़ा करता। लेकिन कुछ ही दिनों बाद, गाँव में एक बहुत तेज़ तूफान आया। अर्जुन ने पौधे को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तूफान इतना तेज़ था कि पौधा जड़ से उखड़ गया। अर्जुन फूट-फूट कर रोने लगा। उसने कहा, 'सब खत्म हो गया! मैं अब कभी कुछ नहीं करूँगा, मैं हार गया हूँ।'
तभी उसके दादाजी उसके पास आए और बोले, 'अर्जुन, समझदार लोग दो बातें याद रखते हैं। पहली यह कि ऐसा कोई काम न करें जिससे नुकसान हो। और दूसरी यह कि यदि कोई काम करने के बाद वह असफल हो जाए, तो उससे घबराकर हार न मानें। असफलता का अर्थ यह नहीं कि सब खत्म हो गया।'
दादाजी की बात सुनकर अर्जुन को हिम्मत मिली। उसने अपने आँसू पोंछे और एक नया पौधा लगाया। इस बार उसने पौधे के चारों ओर एक छोटी सी सुरक्षा दीवार भी बनाई। उसकी मेहनत रंग लाई और उसका बगीचा फिर से महक उठा।