बहुत समय पहले की बात है, चोल साम्राज्य के पास एक शांत गाँव में इलंगो नाम का एक युवक रहता था। इलंगो बहुत ही सरल स्वभाव का था और सभी के प्रति बहुत दयालु था।
एक बार चोल राजा और पड़ोसी राज्य के राजा के बीच विवाद हो गया। पड़ोसी राजा बहुत ही क्रोधी स्वभाव का था और वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। चोल राजा को शांति वार्ता के लिए एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो समझदार हो।
इलंगो के पिता एक विद्वान थे। उन्होंने इलंगो को दूत बनाकर भेजने का निर्णय लिया। इलंगो घबरा गया। उसने पूछा, 'पिताजी, मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ, मैं एक शक्तिशाली राजा से कैसे बात करूँगा?' उसके पिता ने मुस्कुराकर कहा, 'पुत्र, तुम्हारी बातें नहीं, बल्कि तुम्हारा चरित्र काम आएगा। तुम्हारा प्रेम और तुम्हारे संस्कार ही तुम्हारी शक्ति बनेंगे।'
जब इलंगो राजा के दरबार में पहुँचा, तो वह डरा नहीं। उसने बहुत ही सम्मान और विनम्रता के साथ बात की। उसके बात करने के तरीके में उसके परिवार की गरिमा और दूसरों के प्रति सच्चा प्रेम झलक रहा था। उसने केवल संदेश नहीं पहुँचाया, बल्कि राजा के आत्मसम्मान का भी ध्यान रखा।
इलंगो के अच्छे व्यवहार और गुणों को देखकर पड़ोसी राजा का हृदय परिवर्तन हो गया। राजा ने उसकी बातों पर विश्वास किया और दोनों राज्यों के बीच शांति समझौता हो गया। इलंगो के प्रेम और अच्छे संस्कारों ने एक बड़े युद्ध को टाल दिया।