सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव में आरव नाम का एक युवक रहता था। आरव बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसमें एक कमी थी—उसे गुस्से में अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाना नहीं आता था।
एक बार, पड़ोसी देश के राजा ने आरव के राजा को एक पत्र भेजा। उस पत्र में राजा के कुछ फैसलों की कड़ी आलोचना की गई थी। इस संदेश को पहुँचाने के लिए आरव को चुना गया। जब आरव दूसरे देश के दरबार में पहुँचा, तो वहाँ के मंत्रियों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। एक मंत्री ने उसे उकसाते हुए कहा, 'क्या तुम्हारे राजा को नहीं पता कि उनके फैसले कितने बेवकूफी भरे हैं?'
आरव को बहुत गुस्सा आया। वह उस मंत्री को पलटकर जवाब देने ही वाला था कि अचानक वह रुक गया। उसने सोचा, 'अगर मैंने गुस्से में कुछ कह दिया, तो इससे मेरे राजा की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी। मुझे केवल राजा के फैसलों के पीछे के कारणों को ही बताना चाहिए।'
उसने अपने क्रोध पर काबू पाया और बहुत ही शांति और सम्मान के साथ राजा के निर्णयों की व्याख्या की। उसकी इस समझदारी को देखकर वहाँ मौजूद सभी लोग दंग रह गए। अंत में, उस राजा ने आरव के व्यवहार की प्रशंसा की और दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने का निर्णय लिया। आरव ने सीखा कि शब्दों पर नियंत्रण रखना ही असली ताकत है।