एक सुंदर गाँव में कविन और अर्जुन नाम के दो मित्र रहते थे। वे दिखने में बिल्कुल एक जैसे थे—एक ही स्कूल में पढ़ते थे, एक जैसे कपड़े पहनते थे और एक जैसे खेल खेलते थे। देखने वाले को वे जुड़वाँ भाई लगते थे। एक बार गाँव के मुखिया ने गाँव के उत्सव की व्यवस्था संभालने के लिए एक समझदार व्यक्ति की तलाश शुरू की।
कविन बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसे हर काम के लिए किसी के बताने की ज़रूरत पड़ती थी। अगर कोई प्यासा होता, तो वह तब तक नहीं समझ पाता जब तक कोई उससे पानी न माँग ले। दूसरी ओर, अर्जुन शांत स्वभाव का था। वह लोगों के चेहरे के भाव देखकर ही उनकी ज़रूरत समझ जाता था। उत्सव के दौरान, अर्जुन ने देखा कि बुजुर्गों को बैठने में दिक्कत हो रही है और उन्हें प्यास लगी है। बिना किसी के कहे, उसने तुरंत उनके लिए बैठने की व्यवस्था और पानी का प्रबंध कर दिया। मुखिया ने मुस्कुराते हुए कहा, 'कविन और अर्जुन देखने में तो एक जैसे हैं, लेकिन दूसरों के बिना कहे उनके मन की बात समझ लेना ही उन्हें एक-दूसरे से अलग बनाता है।' कविन को अपनी कमी समझ में आ गई और उसने दूसरों की भावनाओं को समझना सीखा।