प्राचीन काल में विक्रम नाम का एक राजकुमार था। वह अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध था। एक बार जब राज्य पर आक्रमण हुआ, तो विक्रम ने युद्ध के मैदान में बिना डरे दुश्मनों का सामना किया। उसकी बहादुरी की चर्चा चारों ओर होने लगी। लोग उसे एक महान योद्धा मानने लगे।
कुछ समय बाद, राजदरबार में एक महत्वपूर्ण सभा बुलाई गई। सभा में राज्य के सबसे बुद्धिमान विद्वान और अनुभवी मंत्री बैठे थे। चर्चा के दौरान, एक मंत्री ने एक नए नियम का प्रस्ताव रखा। ध्यान से सुनने पर विक्रम को लगा कि उस नियम में एक बड़ी कमी है।
युद्ध के मैदान में तो विक्रम कभी नहीं डरा, लेकिन इस सभा में उसे डर लग रहा था। उसने सोचा, 'अगर मैंने अपनी बात रखी, तो क्या ये विद्वान मेरा मज़ाक उड़ाएंगे? क्या वे मुझे कमज़ोर समझेंगे?'
थोड़ी देर हिचकिचाने के बाद, विक्रम ने साहस जुटाया और विनम्रतापूर्वक अपनी बात सबके सामने रखी। सभा में सन्नाटा छा गया। लेकिन कुछ ही क्षणों बाद, मुख्य विद्वान ने कहा, 'राजकुमार सही कह रहे हैं, उनकी बात में दम है।' सभी ने विक्रम की बुद्धिमानी की प्रशंसा की। उस दिन विक्रम ने सीखा कि शत्रु के सामने मरना आसान है, लेकिन विद्वानों की सभा में बिना डरे सत्य बोलना ही असली वीरता है।