एक छोटे से गाँव में अरुण नाम का एक किसान रहता था। उसके पास काफी अनाज और धन था। लेकिन उसका पड़ोसी विक्रम उसका कट्टर दुश्मन था। सालों पहले हुई एक छोटी सी बात ने उनके बीच नफरत की एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी थी। वे एक-दूसरे से बात तक नहीं करते थे।
एक साल गाँव में भीषण सूखा पड़ा। विक्रम की सारी फसलें बर्बाद हो गईं और उसका परिवार भूखा रहने लगा। अरुण यह सब देख रहा था। उसके मन में द्वंद्व चल रहा था। उसके अहंकार ने कहा, 'वह मेरा दुश्मन है, मैं उसकी मदद क्यों करूँ?' लेकिन उसके दिल ने कहा, 'सच्ची संपत्ति वही है जो दूसरों के काम आए।'
अरुण ने एक फैसला किया। आधी रात को, वह अनाज की बोरियाँ और कुछ सब्जियाँ लेकर गया और चुपचाप विक्रम के दरवाज़े पर रख आया। अगली सुबह जब विक्रम ने वह अनाज देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। अरुण की इस उदारता ने वर्षों से जमी नफरत की बर्फ को पिघला दिया। विक्रम को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह दौड़कर अरुण के पास गया। उस दिन से उनकी दुश्मनी खत्म हो गई और वे अच्छे दोस्त बन गए।