अर्जुन नाम का एक लड़का था, जिसका सपना एक महान योद्धा बनने का था। उसका दोस्त रोहन हमेशा आरामदेह चीज़ें पसंद करता था, लेकिन अर्जुन चुनौतियों की तलाश में रहता था। एक बार गाँव में ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता हुई। अर्जुन जब पहाड़ चढ़ रहा था, तो वह कई बार फिसला, उसके घुटनों में चोट लगी और वह बहुत थक गया। लेकिन उसने हार नहीं मानी और ऊपर तक पहुँच गया।
घर लौटने पर अर्जुन ने अपनी डायरी देखी। उसमें कई ऐसे दिन थे जब उसने बिना किसी मेहनत या संघर्ष के शांति से समय बिताया था। उन दिनों को देखकर उसे अजीब सी कमी महसूस हुई। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, जिन दिनों मुझे कोई चोट नहीं लगी या कोई कठिनाई नहीं हुई, उन्हें मैं बेकार के दिन क्यों मान रहा हूँ?"
उसके पिता ने प्यार से समझाया, "बेटा, एक सच्चे योद्धा के लिए वे दिन व्यर्थ हैं जिनमें कोई संघर्ष न हुआ हो। कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ ही इंसान को निखारती हैं। तुम्हारे शरीर पर लगे निशान तुम्हारी कमजोरी नहीं, बल्कि तुम्हारी हिम्मत की निशानी हैं। जो दिन बिना किसी प्रयास के बीत जाते हैं, वही वास्तव में व्यर्थ होते हैं।"