एक समय की बात है, एक विशाल साम्राज्य की सीमा पर अर्जुन नाम का एक युवा सैनिक रहता था। अर्जुन बहुत बहादुर था, लेकिन उसके मन में एक ही इच्छा थी—पूरी दुनिया में उसका नाम हो।
एक बार राज्य पर युद्ध का संकट मंडराने लगा। अर्जुन ने अपनी तलवार और कवच को चमका लिया। वह युद्ध के लिए तैयार था, लेकिन उसका ध्यान देश की रक्षा से ज्यादा इस बात पर था कि युद्ध में वह कितना प्रसिद्ध होगा।
युद्ध के मैदान में, दुश्मन सेना एक संकरी घाटी से निकलकर पीछे से हमला करने की कोशिश कर रही थी। अर्जुन ने सोचा कि अगर वह अकेले ही उस घाटी में घुसकर हमला करेगा, तो सब उसकी बहादुरी के गुण गाएंगे। यह एक आत्मघाती कदम था।
उसके सेनापति, विक्रम ने उसे रोका और कहा, 'अर्जुन, केवल प्रसिद्धि पाने के लिए जान जोखिम में डालना मूर्खता है। यह वैसा ही है जैसे कोई स्त्री अपने पैरों में पायल पहनकर यह सोचे कि पायल की छन-छन उसे दुश्मनों से बचा लेगी। पायल सुंदरता के लिए होती है, सुरक्षा के लिए नहीं।'
अर्जुन को अपनी गलती समझ आई। उसने सोचा कि अगर वह मर गया, तो देश की रक्षा कौन करेगा? उसने अपनी योजना बदली। उसने अकेले जाने के बजाय, एक छोटी और समझदार टुकड़ी बनाई और रणनीति के साथ दुश्मनों को घेर लिया।
जीत के बाद, लोगों ने अर्जुन की बहादुरी से ज्यादा उसकी सूझबूझ की प्रशंसा की। अर्जुन समझ गया कि असली वीरता नाम कमाने में नहीं, बल्कि समझदारी से अपना कर्तव्य निभाने में है।