एक सुंदर से गाँव में कविन और मिथुन नाम के दो मित्र रहते थे। कविन बहुत ऊर्जावान था, लेकिन वह बिना सोचे-समझे काम करता था। वहीं मिथुन शांत और समझदार था।
एक बार, गाँव के उत्सव के लिए बचाए गए पैसों को कविन गलत तरीके से खर्च करने की योजना बनाने लगा। 'मित्र, चलो इन पैसों को दिखावे में उड़ा देते हैं!' कविन ने कहा। लेकिन मिथुन ने उसे रोका। 'नहीं कविन, यह गलत है। हमें यह पैसा अच्छे कामों के लिए बचाकर रखना चाहिए।' कविन पहले तो नाराज हुआ, लेकिन मिथुन की बात मानकर उसने अपनी गलती सुधार ली।
कुछ महीनों बाद, कविन के पिता बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। कविन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे और वह बहुत परेशान था। मिथुन तुरंत उसके पास आया और बोला, 'चिंता मत करो कविन, मैं तुम्हारे साथ हूँ।' मिथुन ने अपनी सारी जमा पूँजी कविन की मदद के लिए दे दी और उसके दुख में सहभागी बना। कविन समझ गया कि सच्चा मित्र वही है जो आपको गलत रास्ते पर जाने से रोके और मुसीबत में आपका साथ दे।