एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक कुशल कुम्हार रहता था। उसके बनाए मिट्टी के बर्तन बहुत ही सुंदर और मजबूत होते थे। आर्यन का विक्रम नाम का एक बहुत करीबी दोस्त था। आर्यन को विक्रम पर अटूट विश्वास था, लेकिन जैसे-जैसे आर्यन की प्रसिद्धि बढ़ी, विक्रम के मन में जलन पैदा होने लगी। वह बाहर से तो दोस्त बना रहा, पर भीतर ही भीतर उसके मन में आर्यन के प्रति द्वेष पनपने लगा।
एक बार आर्यन राजा के लिए एक बहुत बड़ा और सुंदर घड़ा बना रहा था। यह उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काम था। जब आर्यन काम में व्यस्त था, तब विक्रम वहाँ आया और मदद करने के बहाने घड़े की बनावट में एक ऐसी छोटी सी कमी कर दी जो तुरंत दिखाई नहीं दे रही थी। आर्यन ने उस समय इसे अनदेखा कर दिया।
जब घड़ा सूखकर पकने के लिए तैयार हुआ, तो उसमें एक बड़ी दरार आ गई और वह टूट गया। आर्यन बहुत दुखी हुआ। तब उसके बुजुर्ग दादाजी ने उसे समझाया, 'आर्यन, बाहर के दुश्मनों से उतना मत डरो जितना अपने भीतर छिपे दुश्मनों से डरना चाहिए। जैसे एक कुम्हार का औजार अगर गलत तरीके से इस्तेमाल हो तो बर्तन टूट जाता है, वैसे ही मित्र के रूप में छिपा हुआ द्वेष इंसान को बर्बाद कर देता है।' आर्यन को अपनी भूल समझ आ गई।