एक सुंदर से गाँव में रवि और कार्तिक नाम के दो पक्के दोस्त रहते थे। वे बचपन से साथ खेले और बढ़े थे। रवि स्वभाव से अच्छा था, लेकिन उसके मन में कभी-कभी छोटी सी ईर्ष्या आ जाती थी। एक बार गाँव के उत्सव की सजावट की जिम्मेदारी कार्तिक को दी गई। कार्तिक ने बहुत मेहनत की और सब कुछ बहुत सुंदर बनाया। रवि बाहर से तो मुस्कुरा रहा था, लेकिन मन ही मन एक कड़वाहट पाल रहा था—'यह काम तो मैं भी कर सकता था, कार्तिक को ही क्यों मिला?'
रवि ने यह बात कार्तिक से नहीं कही, बल्कि अपने मन में ही उसे बढ़ाता रहा। धीरे-धीरे उसने दूसरे दोस्तों के सामने कार्तिक की बुराई करना शुरू कर दिया। वह कहता, 'कार्तिक अब बहुत घमंडी हो गया है।' रवि की इस गुप्त शत्रुता ने धीरे-धीरे दोस्तों के बीच गलतफहमियां पैदा कर दीं। जो दोस्त कभी साथ हुआ करते थे, अब वे एक-दूसरे से बात नहीं करते थे और आपस में लड़ने लगे। गाँव का माहौल तनावपूर्ण हो गया।
गाँव के एक बुजुर्ग ने रवि के व्यवहार में यह बदलाव देखा। उन्होंने रवि को समझाते हुए कहा, 'बेटा, अगर मन में बैठी कड़वाहट को बाहर नहीं निकाला, तो वह जहर की तरह तुम्हारे रिश्तों को खत्म कर देगी।' रवि को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह कार्तिक के पास गया और उससे माफी मांगी। जैसे ही रवि ने अपने मन को साफ किया, दोस्तों के बीच की दूरियां मिट गईं और सब फिर से पहले की तरह मिल-जुलकर रहने लगे।