एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह मेहनती तो था, लेकिन उसमें एक बड़ी कमी थी—वह कभी किसी की सलाह नहीं मानता था। एक दिन गाँव के बुजुर्ग, राघव जी ने उसे समझाया, 'अर्जुन, हमेशा सही रास्ते पर चलो। अगर तुम उन लोगों को परेशान करोगे जो तुम्हें सुधारने की शक्ति रखते हैं, तो तुम खुद का ही नुकसान करोगे।'
अर्जुन ने उनकी बात अनसुनी कर दी। कुछ दिनों बाद, उसने विक्रम नाम के एक ईमानदार व्यापारी को धोखा देकर लाभ कमाने की कोशिश की। अर्जुन ने सोचा, 'विक्रम मेरा क्या बिगाड़ लेगा?'
जब विक्रम ने पंचायत में इसकी शिकायत की, तो अर्जुन ने माफी माँगने के बजाय पंचायत के सदस्यों का अपमान किया और उनके अधिकार को चुनौती दी। उसे लगा कि वह बहुत बहादुर है, लेकिन असल में वह बहुत मूर्ख बन रहा था। उसके इस व्यवहार से गाँव के सभी लोग उससे नाराज हो गए।
धीरे-धीरे गाँव में कोई भी अर्जुन के साथ व्यापार करने या उसकी मदद करने को तैयार नहीं था। वह अकेला पड़ गया। तब उसे समझ आया कि बड़ों की सीख को न मानना और न्याय करने वालों को चुनौती देना विनाश का मार्ग है।