एक शांत गाँव में कदिर नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत प्रतिभाशाली था और उसका सपना दुनिया का सबसे महान मूर्तिकार बनने का था। शुरुआत में, कदिर बहुत मेहनत करता था और पत्थरों में जान फूंक देता था।
लेकिन धीरे-धीरे कदिर का ध्यान भटकने लगा। वह जीवन के क्षणिक सुखों, दिखावे और दूसरों का ध्यान खींचने की चाहत में डूब गया। उसने अपनी कला के बजाय विलासिता और इंद्रियों के सुखों को अधिक महत्व देना शुरू कर दिया। उसके मित्र मारन ने उसे समझाया, "कदिर, तुम अपने लक्ष्य से भटक रहे हो। यह रास्ता तुम्हें महानता की ओर नहीं ले जाएगा।"
कदिर ने उसकी बात अनसुनी कर दी। वह अपनी भावनाओं और इच्छाओं का गुलाम बन गया। समय बीतने के साथ, उसकी कलात्मक शक्ति कम होने लगी और वह एक साधारण व्यक्ति बनकर रह गया। एक दिन जब उसने अपनी अधूरी मूर्ति को देखा, तो उसे अहसास हुआ कि जो व्यक्ति केवल सुखों के पीछे भागता है, वह कभी भी अपने जीवन के उच्च आदर्शों और महानता को प्राप्त नहीं कर सकता।