एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक ईमानदार लकड़हारा रहता था। वह बहुत गरीब था, लेकिन अपनी मेहनत की कमाई से ही अपना गुजारा करता था। एक दिन, गाँव के सबसे अमीर और लालची आदमी, धनराज ने उसे अपने पास बुलाया। धनराज गलत तरीकों से पैसा कमाता था। उसने माधव से कहा, 'माधव, तुम इतनी मेहनत क्यों करते हो? मेरे साथ काम करो, मैं तुम्हें बहुत पैसा दूँगा, लेकिन तुम्हें मेरे गलत कामों में मेरा साथ देना होगा।'
माधव एक पल के लिए ठिठक गया। उसे अपने परिवार की गरीबी याद आई, लेकिन उसकी अंतरात्मा ने उसे रोक लिया। उसे पता था कि धनराज के रास्ते पर चलकर वह अमीर तो बन सकता है, लेकिन अपनी इज्जत खो देगा। माधव ने विनम्रता से कहा, 'सेठ जी, मुझे धन की आवश्यकता है, लेकिन आपके गलत रास्तों पर चलकर अपना सम्मान खोना मुझे मंजूर नहीं। मैं गरीबी में ही ठीक हूँ, पर अपनी ईमानदारी के साथ जीना चाहता हूँ।'
सालों बीत गए। धनराज के गलत कामों की वजह से उसका सारा धन डूब गया और वह अपमानित हुआ। वहीं माधव अपनी छोटी सी कुटिया में खुश था और पूरा गाँव उसका सम्मान करता था। जब माधव का निधन हुआ, तो लोगों ने कहा, 'एक महान और ईमानदार व्यक्ति चला गया।' माधव ने सिखाया कि धन के लिए अपना चरित्र बेचना सबसे बड़ी हार है।