एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसका सपना था कि वह शहर जाकर बड़ा आदमी बने और आलीशान ज़िंदगी जिए। उसके पिता, रामू, एक मेहनती किसान थे। रामू अक्सर कहते थे, 'बेटा, यह मिट्टी ही हमारा जीवन है, इसका सम्मान करना सीखो।' लेकिन अर्जुन को खेती करना बहुत उबाऊ लगता था।
एक दिन अर्जुन शहर चला गया। उसने वहाँ कई काम किए, लेकिन एक बड़े संकट के कारण शहर में काम मिलना मुश्किल हो गया। जब अर्जुन के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा, तब उसे अपने पिता की बात याद आई। उसे समझ आया कि चाहे इंसान कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए, अंत में उसे पेट भरने के लिए अन्न की ही ज़रूरत होती है।
अर्जुन वापस अपने गाँव लौटा। उसने देखा कि उसके पिता धूप में पसीना बहाकर खेत जोत रहे हैं। अर्जुन दौड़कर उनके पास गया और बोला, 'पिताजी, मैं समझ गया। हम दुनिया में कहीं भी घूम लें, लेकिन अंत में हमें जीवित रहने के लिए किसान की ही ज़रूरत पड़ती है।' रामू की आँखों में खुशी के आँसू आ गए और अर्जुन ने भी खेत में हाथ बँटाना शुरू कर दिया।