एक सुंदर से गाँव में मारन अपने माता-पिता के साथ रहता था। मारन के पिता एक किसान थे। वे रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले ही खेतों में निकल जाते और कड़ी मेहनत करते थे। मारन अक्सर कहता, 'पिताजी, आप हमेशा मिट्टी में क्यों सने रहते हैं? हमें शहर जाकर कोई बड़ी नौकरी करनी चाहिए!'
एक बार उस इलाके में भयंकर सूखा पड़ा। नदियाँ सूख गईं और फसलें बर्बाद होने लगीं। मारन का दोस्त कार्तिक, जो शहर में एक बड़ी कंपनी में काम करता था, गाँव आया। कार्तिक बहुत परेशान दिख रहा था। उसने कहा, 'मारन, शहर में काम करना आसान लगता है, लेकिन हम सब दूसरों पर निर्भर हैं। खाने-पीने की हर चीज़ के लिए हमें दूसरों की तरफ देखना पड़ता है। अगर कोई संकट आ जाए, तो हम असहाय हो जाते हैं।'
दूसरी ओर, मारन के परिवार के पास उनके द्वारा उगाया गया अनाज सुरक्षित था, जिसने उन्हें उस कठिन समय में भूखा नहीं रहने दिया। मारन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझा कि जो व्यक्ति अपनी धरती से अन्न उगाता है, वही वास्तव में स्वतंत्र है और उसे किसी के आगे झुकने की ज़रूरत नहीं है। उस दिन के बाद, मारन ने भी अपने पिता के साथ खेतों में काम करना शुरू कर दिया।