एक छोटे से गाँव में मुत्तु नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। मुत्तु को पेड़-पौधे लगाने का बहुत शौक था। एक दिन, दादाजी ने उसे कुछ बीज दिए और कहा, 'बेटा, इन्हें बोना और इनकी देखभाल करना।'
मुत्तु बहुत खुश हुआ। उसने उत्साह के साथ ज़मीन खोदी और बीज बो दिए। वह रोज़ाना पौधों को खूब सारा पानी देने लगा। लेकिन कुछ हफ़्तों बाद, मुत्तु उदास हो गया। पौधे बढ़ तो रहे थे, लेकिन वे बहुत कमज़ोर थे और उनके आसपास उगी जंगली घास (खरपतवार) उन्हें दबा रही थी। मुत्तु ने रोते हुए पूछा, 'दादाजी, मैं रोज़ पानी देता हूँ, फिर भी पौधे अच्छे क्यों नहीं बढ़ रहे?'
दादाजी ने प्यार से समझाया, 'मुत्तु, सिर्फ ज़मीन खोदना काफी नहीं है, मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए उसमें खाद डालना भी ज़रूरी है। और एक बार जब पौधे उग जाएँ, तो सिर्फ पानी देना ही काफी नहीं होता; खरपतवार को हटाकर पौधों की लगातार देखभाल करना सबसे ज़रूरी है।'
मुत्तु को अपनी गलती समझ आ गई। उसने केवल पानी देना ही नहीं, बल्कि मिट्टी में खाद डालना और खरपतवार हटाना भी शुरू कर दिया। वह रोज़ पौधों को ध्यान से देखता। कुछ ही समय में, मुत्तु का बगीचा हरा-भरा और सुंदर हो गया। उसने सीखा कि किसी काम को शुरू करना ही काफी नहीं है, उसे सही ढंग से सँभालना और निखारना असली सफलता है।