एक सुंदर से गाँव में कथिर नाम का एक किसान रहता था। उसके पास बहुत उपजाऊ ज़मीन थी। एक दिन कथिर के मन में आलस आ गया। उसने सोचा, 'मैं धूप में क्यों मेहनत करूँ? मैं मज़दूरों को पैसे दे दूँगा और वे सारा काम कर देंगे। मैं आराम करूँगा।'
कथिर ने खेतों की देखभाल करना छोड़ दिया और बस आराम करने लगा। उसने सारा काम मज़दूरों पर छोड़ दिया। लेकिन ज़मीन को तो अपने मालिक के हाथ और देखभाल की ज़रूरत थी। कथिर के ध्यान न देने के कारण खेतों में खरपतवार उग आई और पानी की कमी हो गई। मज़दूरों ने भी ढिलाई बरतनी शुरू कर दी।
जब कटाई का समय आया, तो कथिर जब खेत पहुँचा, तो वहाँ सुनहरी फसल के बजाय सूखे हुए पौधे देखे। उसे लगा जैसे ज़मीन उससे नाराज़ है और उसने उसे फल देने से मना कर दिया है। कथिर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने फिर से कुदाल उठाई और खुद खेत में काम करने लगा। जब उसने खुद मिट्टी को सींचा और पौधों की देखभाल की, तब जाकर ज़मीन ने फिर से मुस्कुराकर उसे भरपूर फसल दी।