एक शांत गाँव में ईशान नाम का एक युवक रहता था। ईशान बहुत बुद्धिमान था और उसकी बातों में बहुत गहराई थी। वह किसी भी समस्या का समाधान बहुत ही स्पष्टता से कर सकता था। लेकिन, ईशान बहुत गरीब था। उसके पास रहने के लिए ढंग का घर भी नहीं था और उसके कपड़े फटे हुए थे।
उसी गाँव में सेठ धनीराम रहते थे, जो बहुत समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। एक दिन गाँव के लोगों ने एक नई नहर बनाने के बारे में चर्चा करने के लिए सभा बुलाई। ईशान खड़ा हुआ और उसने बहुत ही विद्वतापूर्ण तरीके से नहर बनाने की योजना और उसके फायदों के बारे में बताया। उसकी बातें तर्कसंगत और बहुत प्रभावशाली थीं।
लेकिन जब ईशान चुप हुआ, तो गाँव वालों ने उसकी ओर देखा और आपस में फुसफुसाने लगे, 'बात तो सही कह रहा है, पर इसके पास तो खुद के लिए कुछ नहीं है, इसकी बातों पर हम भरोसा कैसे करें?' ईशान के ज्ञान को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।
तभी सेठ धनीराम उठे और उन्होंने एक बहुत ही साधारण सी सलाह दी। लेकिन चूंकि वे धनी और सम्मानित थे, लोगों ने उनकी बात को तुरंत मान लिया और काम शुरू कर दिया। ईशान यह देखकर दुखी हो गया। उसने महसूस किया कि कभी-कभी इंसान की बुद्धिमानी से ज्यादा उसकी आर्थिक स्थिति को महत्व दिया जाता है।