एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने माता-पिता के साथ रहता था। उसके पिता एक बहुत बड़े व्यापारी थे। एक दिन अर्जुन ने अपने पिता से पूछा, 'पिताजी, हमारे पास सब कुछ है—बड़ा घर, अच्छा खाना और कपड़े। फिर हमें दूसरों की क्या ज़रूरत?'
उसके पिता उसे एक लकड़ी की कठपुतली के पास ले गए। उन्होंने कहा, 'अर्जुन, इस कठपुतली को देखो। यह नाचती है, हिलती है, लेकिन इसे चलाने के लिए किसी धागे की ज़रूरत होती है। अगर धागा खींचने वाला कोई न हो, तो यह सिर्फ लकड़ी का एक बेजान टुकड़ा है।'
अगले दिन, अर्जुन ने सड़क किनारे एक बूढ़े व्यक्ति को देखा जो बहुत भूखे लग रहे थे। अर्जुन ने बिना सोचे अपनी रोटी उन्हें दे दी। उस वृद्ध व्यक्ति की आँखों में जो चमक और मुस्कान थी, उसने अर्जुन के दिल को छू लिया। अर्जुन को समझ आया कि अगर दुनिया में कोई ज़रूरत मंद न हो, तो हमारा जीवन भी उस कठपुतली की तरह मशीनी और बेजान हो जाएगा। दूसरों की मदद करने से ही जीवन में असली भावनाएँ और अर्थ आता है।