एक शांत गाँव में माया नाम की एक युवती रहती थी। माया अपनी सादगी और अपनी आँखों की सौम्यता के लिए जानी जाती थी। जहाँ गाँव की अन्य लड़कियाँ सोने और हीरों के गहनों के सपने देखती थीं, वहीं माया को अपने सरल स्वभाव में ही खुशी मिलती थी।
एक दिन, गाँव के एक धनी व्यापारी ने माया की शालीनता देखी और वह उसकी सुंदरता पर मोहित हो गया। उसने माया को कीमती हीरों का हार भेंट करने का निर्णय लिया। उसने कहा, "इन गहनों को पहनकर तुम और भी सुंदर लगोगी।" माया ने बहुत ही विनम्रता से उत्तर दिया, "सेठ जी, ये गहने सुंदर हैं, लेकिन मेरी विनम्रता और मेरी सादगी के सामने इनका कोई मोल नहीं है। मेरा चरित्र ही मेरा असली श्रृंगार है।" व्यापारी माया की इस बात से बहुत प्रभावित हुआ। उसने महसूस किया कि बाहरी चमक-धमक से कहीं अधिक मूल्यवान इंसान का आंतरिक गुण और उसका शालीन व्यवहार होता है।